आद्य प्रवर्तक · आचार्य श्री भिक्षुशुद्ध साधना की खोज से
एक अनुशासित धर्मसंघ तक
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ का उद्भव अठारहवीं शताब्दी में आचार्य भिक्षु के सत्य-अन्वेषण और शुद्ध साधुचर्या के आग्रह से हुआ। आगमों के गहन अध्ययन के आधार पर उन्होंने अनुभव किया कि धार्मिक आचरण को वीतरागता, आत्मशुद्धि, अहिंसा, संयम और तप की कसौटी पर पुनः प्रतिष्ठित करना आवश्यक है।
विक्रम संवत् 1817 की आषाढ़ पूर्णिमा को केलवा में इस नवधर्म क्रांति ने सुव्यवस्थित रूप ग्रहण किया। प्रारम्भिक धर्मसंघ में तेरह साधु और तेरह श्रावक जुड़े। आगे चलकर यही परम्परा एक आचार्य, स्पष्ट मर्यादा और समर्पित चतुर्विध संघ की विशिष्ट पहचान बनी।

