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इतिहास · दर्शन · मर्यादा

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ

Origin, discipline and the living tradition of Terapanth
तेरापंथ के संस्थापक आचार्य श्री भिक्षुआद्य प्रवर्तक · आचार्य श्री भिक्षु
स्थापना · 29 जून 1760

शुद्ध साधना की खोज से
एक अनुशासित धर्मसंघ तक

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ का उद्भव अठारहवीं शताब्दी में आचार्य भिक्षु के सत्य-अन्वेषण और शुद्ध साधुचर्या के आग्रह से हुआ। आगमों के गहन अध्ययन के आधार पर उन्होंने अनुभव किया कि धार्मिक आचरण को वीतरागता, आत्मशुद्धि, अहिंसा, संयम और तप की कसौटी पर पुनः प्रतिष्ठित करना आवश्यक है।

विक्रम संवत् 1817 की आषाढ़ पूर्णिमा को केलवा में इस नवधर्म क्रांति ने सुव्यवस्थित रूप ग्रहण किया। प्रारम्भिक धर्मसंघ में तेरह साधु और तेरह श्रावक जुड़े। आगे चलकर यही परम्परा एक आचार्य, स्पष्ट मर्यादा और समर्पित चतुर्विध संघ की विशिष्ट पहचान बनी।

आचार्य भिक्षु का समर्पण-सूत्र“हे प्रभो! यह तेरापंथ है,
इसमें मेरा कुछ भी नहीं है।”

“तेरा” यहाँ केवल संख्या का संकेत नहीं, प्रभु महावीर के प्रति संबंध और समर्पण का भाव है—यह तुम्हारा पंथ है। आचार्य भिक्षु ने स्वयं को इसका स्वामी नहीं, वीतराग प्रभु के मार्ग का साधक माना।

नामकरण की कथा

“तेरापंथ” का अर्थ

जोधपुर में एक प्रसंग के दौरान तेरह श्रावकों और तेरह साधुओं से जुड़ी संख्या के आधार पर “तेरापंथ” शब्द प्रचलित हुआ। जब यह नाम आचार्य भिक्षु तक पहुँचा, उन्होंने उसे अहंकार से नहीं, प्रभु-समर्पण से स्वीकार किया।

उन्होंने इसकी गुणपरक व्याख्या पाँच महाव्रत, पाँच समितियाँ और तीन गुप्तियाँ—कुल तेरह अनुशासन-सूत्रों—से भी की। इस प्रकार नाम में संख्या, साधना और समर्पण तीनों अर्थ समाहित हो गए।

उद्भव यात्रा

क्रांति से धर्मसंघ तक

  1. 01
    आगम-मंथन

    आचार्य भिक्षु ने साधुचर्या और प्रचलित धार्मिक मान्यताओं का आगम की कसौटी पर गंभीर परीक्षण किया।

  2. 02
    अभिनिष्क्रमण

    शुद्ध साधना के संकल्प के साथ उन्होंने कठिन विरोध और सामाजिक बहिष्कार के बीच स्वतंत्र साधना-पथ अपनाया।

  3. 03
    केलवा, 1760

    आषाढ़ पूर्णिमा पर धर्मक्रांति ने संस्थागत रूप लिया; यही तेरापंथ स्थापना दिवस माना जाता है।

  4. 04
    मर्यादित धर्मसंघ

    एक आचार्य और सुव्यवस्थित मर्यादा के अधीन साधु-साध्वी तथा श्रावक-श्राविका परम्परा विकसित हुई।

धर्मसंघ की आत्मा

सिद्धांत और संरचना

व्यक्ति से ऊपर मर्यादा, पद से ऊपर साधना और संगठन के केंद्र में आत्मकल्याण।

01

एक आचार्य

धर्मसंघ का आध्यात्मिक और अनुशासनात्मक नेतृत्व एक आचार्य के अधीन रहता है। उत्तराधिकारी का चयन वर्तमान आचार्य द्वारा किए जाने की परम्परा ने नेतृत्व की निरंतरता बनाए रखी है।

02

मर्यादा और अनुशासन

साधु-साध्वियों की चर्या, विहार, चातुर्मास और संघीय व्यवस्था निर्धारित मर्यादाओं के अनुरूप संचालित होती है। मर्यादा केवल प्रशासन नहीं, साधना की सुरक्षा है।

03

आगम-आधारित साधना

अहिंसा, संयम, तप, सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र—आत्मशुद्धि की दिशा में तेरापंथ की साधना-दृष्टि के आधार हैं।

04

चतुर्विध धर्मसंघ

साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका—इन चारों घटकों की मर्यादित, सहभागी और उत्तरदायी चर्या धर्मसंघ को जीवंत बनाती है।

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साहित्य, शोध और साधना

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अध्ययन सामग्री · Publications

प्रमुख संदर्भ ग्रंथ

तेरापंथ के इतिहास, दर्शन और अनुशासन को गहराई से समझने के लिए चयनित प्रकाशन।

01

हे प्रभो तेरापंथ

आचार्य भिक्षु, तेरापंथ के नामकरण और गुरु-परम्परा के इतिहास पर विस्तृत ग्रंथ।

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02

आचार्य भिक्षु

मुनि बुद्धमल द्वारा रचित जीवनवृत्त; Jain Vishva Bharati का 2025 संस्करण।

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03

तेरापंथ का इतिहास

मुनि बुद्धमल की इतिहास-श्रृंखला; धर्मसंघ के क्रमिक विकास का प्रमुख संदर्भ।

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04

आचार्य भिक्षु की अनुशासन शैली

साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा द्वारा आचार्य भिक्षु की अनुशासन-दृष्टि का परिचय।

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05

आचार्य भिक्षु तत्त्व साहित्य

आचार्य भिक्षु के तत्त्वचिंतन पर Jain Vishva Bharati द्वारा प्रकाशित संकलन।

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06

सम्बोधि Speako Library

Jain Vishva Bharati के आध्यात्मिक प्रकाशनों का डिजिटल ePub, Mobi और चयनित PDF संग्रह।

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गुरु परम्पराआचार्य भिक्षु से आचार्य महाश्रमण तक
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प्रमुख स्रोत: Jain Vishva Bharati — Inspiration · JVB Publications · जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा — इतिहास · हे प्रभो तेरापंथ

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